शीर्षक: मेरे बचपन पर विचार - शर्म, आज्ञाकारिता और मौन साहस की यात्रा
मेरा बचपन किसी रंग-बिरंगे मेले जैसा नहीं, बल्कि एक शांत आंगन जैसा था - जहाँ डरपोक नज़रों से झाँकना और चुपचाप सब कुछ देखते रहना ही मेरी दुनिया थी।
मैं स्वभाव से शर्मीला था। यह शर्मीलापन कोई कमी नहीं, बल्कि मेरे व्यक्तित्व की परछाई बन गया था। जब दूसरे बच्चे मैदान के बीचो-बीच कूदते-खेलते थे, मैं किनारे पर खड़ा होकर उन्हें देखना पसंद करता था। अजनबियों से बात करना मेरे लिए पहाड़ चढ़ने जैसा था - दिल तेज़ धड़कता, शब्द अटक जाते। मैं अंतर्मुखी था, भीड़ में भी अपने भीतर एक छोटी सी एकांत की दुनिया बनाए रखता था।
शारीरिक रूप से मैं दुबला-पतला और कमजोर था। जो बच्चे ताकतवर और दबंग लगते थे, उनके सामने मैं खुद को और भी छोटा महसूस करता था। इसलिए खेल के मैदान के केंद्र से ज्यादा मुझे उसका किनारा सुरक्षित लगता था। वह किनारा मेरी ढाल थी।
लेकिन इस संकोच के पीछे एक और गुण था - आज्ञाकारिता। मैं अपने माता-पिता, बड़े-बुजुर्गों और गुरुजनों का कहना कभी नहीं टालता था। उनकी विनम्र बात को भी मैं आदेश की तरह मान लेता था। प्राथमिक पाठशाला का वह समय याद आता है, जहाँ की दीवार पर लिखा था - "शिक्षा ही जीवन का आधार है।" वहाँ अनुशासन ही सब कुछ था। आज्ञा मानना मेरी आदत नहीं, मेरी सुरक्षा बन गई थी। मन में एक अनजाना डर हमेशा रहता था कि कहीं डांट न पड़ जाए, कहीं मास्टर जी की छड़ी न उठ जाए। इसी डर ने मुझे अनुशासित तो बनाया, पर कई बार मेरे मन की जिज्ञासा को भी दबा दिया।
पढ़ाई मेरे लिए हमेशा एक संघर्ष रही। ऐसा नहीं था कि मैं पढ़ना नहीं चाहता था, पर मेरा डरपोक स्वभाव अक्सर मेरी बुद्धि पर भारी पड़ जाता था। घर में कोई ऐसा नहीं था जो हाथ पकड़ कर बताए कि कैसे पढ़ना है, कैसे समय-सारणी बनानी है, कैसे मेहनत को आदत बनाना है। बिना मार्गदर्शन के मैं बस अकेला ही इस शैक्षिक सागर में बहता रहा। कोई किनारा, कोई दिशा स्पष्ट नहीं थी।
फिर भी, उस कठिन बचपन में मिठास भी थी। सच की मिठास और स्वाद की मिठास दोनों। कभी-कभी एक छोटी सी टॉफी, गुड़ का टुकड़ा या मेले से लाई जलेबी ही सबसे बड़ा इनाम लगती थी। वह क्षणिक मिठास दिन भर की उदासी और डर को पल भर में भुला देती थी। उसी मिठास में कहीं न कहीं एक उम्मीद भी छिपी थी - कि कोई तो हो जो समझे, कोई तो हो जो रास्ता दिखाए।
आज जब 73 साल की उम्र में पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो समझ आता है कि मेरा बचपन शर्म और आज्ञाकारिता के बीच का एक नाजुक संतुलन था। कमजोरी और सहनशीलता, डर और धीरज - दोनों एक साथ चल रहे थे। हर डांट, हर चुप्पी, हर देखी हुई खेल और हर खाई हुई मिठाई ने मिलकर मुझे गढ़ा है।
वो शर्मीला, किनारे पर खड़ा रहने वाला लड़का ही आज का मैं है - जिसने सीखा कि चुपचाप देखना भी एक शक्ति है, और आज्ञा मानना भी एक प्रकार का साहस है।
